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Vedanti behen and her sisters with baba

महिला सशक्तिकरण का अनूठा कार्य

प्रकृति का शाश्वत नियम है रात के बाद दिन और दिन के बाद रात आने का। ठीक उसी तरह जब-जब मानव अपने धर्म-कर्म-मर्यादाओं से गिर जाता है तब-तब कोई न कोई प्रकाश की किरण ऊपर से नीचे उतरती है जो दिखा जाती है जीवन का यथार्थ मार्ग। कोई न कोई पैगम्बर, महापुरुष, अवतार या मसीहा अवलंबन दे जाता है समाज को। बदल जाती है समय चक्र की धारा। आज हम उसी जगह पुनः खड़े हैं। अनगिनत हृदयों में यह स्वर झंकृत हो रहे हैं कि ‘भगवान आओ, इस व्यथित भू के भार को उतारो, कहाँ हो? यह नाश का खेल कब तक चलता रहेगा।’ निःसंदेह परिवर्तन की इस महावेला में सृष्टि रचयिता निराकार परमपिता परमात्मा शिव स्वयं अवतरित हो एक साधारण तन का आधार लेकर बदल रहे हैं सृष्टि की काया। अति की इति समीप है। धर्मगलानि का समय और परमात्मा के अवतरण का काल यही है। परमात्मा कौन है? क्या उसका भी जन्म अथवा अवतरण होता है? कौन है वह युगपुरुष जो परमात्मा का साकार माध्यम बनता है? कैसे युग परिवर्तन होता है? यह किसी नाटक का संवाद, पटकथा, पहेली अथवा सम्भाषण नहीं। स्वयं परमात्मा यह रहस्य सुलझा रहे हैं।

भगवान के यादगार महावाक्यों में उल्लेख है, ‘मैं साधारण तन में अवतरित होता हूँ।’ दादा लेखराज का तन ही वह साधारण तन है जिसमें भगवान का अवतरण हुआ। दादा लेखराज कलकत्ता में हीरे-जवाहरात का व्यापार करते थे। आपके अंदर बचपन से ही भक्ति के संस्कार थे। आपने लौकिक में 2 गुरु किये थे। साठ वर्ष की आयु में आपको निराकार परमपिता परमात्मा ने इस कलियुगी दुनिया के महाविनाश और आने वाली नई सतयुगी दुनिया के दिव्य साक्षात्कार कराये और आपके तन में प्रविष्ट होकर नये युग की स्थापना का कार्य प्रारंभ किया। आपको अलौकिक नाम मिला ‘प्रजापिता ब्रह्मा’ | गायन है कि प्रजापिता ब्रह्मा ही आदिदेव हैं, बड़ी माँ हैं, प्रथम ब्राह्मण और प्रथम पुरुष हैं। नई सृष्टि की पहली कलम हैं, भगवान के प्रथम पुत्र और सृष्टि के अग्रज, पूर्वज और प्रपितामह हैं। भगवान के बाद सृष्टि रंगमंच के सबसे महत्त्वपूर्ण रंगकर्मी हैं लेकिन फिर भी बिल्कुल गुप्त हैं। आपने ही प्रजापिता ब्रह्मा का कर्त्तव्यवाचक नाम पाकर अपने मस्तक में ज्ञान सागर को समाया और उस ज्ञान सागर ने पतित आत्माओं को पावन बनाने के लिए आपके मुख से ज्ञान- गंगा बहाई।

आपने परमात्मा के आदेश अनुसार अपने व्यापार को समेट लिया और सिन्ध हैदराबाद में अपने ही घर में ओम मण्डली नाम से एक ट्रस्ट बनाकर अपनी संपत्ति कन्याओं माताओं के सामने समर्पित कर दी, इस प्रकार, एक छोटे सत्संग के रूप में प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय की शुरूआत हुई। कराची में समुद्र के किनारे चौदह वर्ष तपस्या करने के पश्चात्‌ सन्‌ 1950 में इस विद्यालय में समर्पित सभी भाई-बहनें स्थानांतरित होकर राजस्थान के अरावली पर्वत – माउंट आबू में आये, यहीं विद्यालय का मुख्यालय स्थापित हुआ। सन्‌ 1952 से भारत में ईश्वरीय सेवायें प्रारंभ हुई। पिताश्री ने अपनी गहन तपस्या एवं उपराम स्थिति द्वारा समाज के हर वर्ग को ऊँचा उठाने की अनुपम सेवा की। अनपढ़ हों या पढ़े-लिखे, गरीब हों या अमीर, नर हों या नारी – सभी की सुषुप्त आध्यात्मिक शक्तितयों को जागृत कर पिताश्री ने उनमें देवत्व भर दिया। लेख के कलेवर को ध्यान में रखते हुए हम उनकी महिलाओं के कल्याण की अद्भुत कार्यविधि का वर्णन कर रहे हैं –

कन्याएँ हैं कन्हैया लाल की

यदि कन्याएँ ईश्वरीय ज्ञान सुनने आतीं तो बाबा कहते, वे तो हैं ही कन्हैया लाल की कन्याएँ। कन्याओं का तो भारत में नवरात्रों में भी पूजन होता है क्योंकि उन्होंने पहले भी भारत को पतित से पावन और पुजारी से पूज्य बनाने का कार्य किया है। भारत की कन्या तो वैसे भी सबसे गरीब है क्योंकि उसका पिता की संपत्ति पर जरा भी अधिकार नहीं है।’

शेर-वाहिनी शक्ति

कन्या तो पहले ही से संन्यास-बुद्धि होती है क्योंकि उसके मन में यह भाव तो सदा बना ही रहता है कि आखिर मुझे इस घर से तो एक दिन जाना ही है और उसमें नम्रता, सहनशीलता तथा संकोच इत्यादि गुण भी होते ही हैं। अत: बाबा कहते – ‘सुशील कन्या तो सौ ब्राह्मणों से भी उत्तम है। यह तो है ही भगवान की अमानत। क्‍यों बच्ची! अब तो विष कभी नहीं पियेंगी और शेर-वाहिनी शक्ति बनेंगी? क्‍यों बच्ची, ऐसा है न?’ तो कन्याएँ कह उठती – हाँ बाबा, हम तो पवित्रता का व्रत ले, भारत की सच्ची सेवा करेंगी। हम ज्ञान-गंगायें बनकर भारत को पावन करने के निमित्त बनेंगी।’ इस प्रकार, पिताश्री कन्याओं के कल्याण के निमित्त बने।

कन्या – पवित्रता और शक्ति का पर्याय

यह कैसे आश्चर्य की बात है कि जहाँ आमतौर पर भारत में, घर में, कन्या का जन्म होने पर माता-पिता उदास-से हो जाते हैं, वहाँ बाबा कन्याओं का ज्ञान में प्रवेश देखकर उन्हें विश्व के लिए शुभ लक्षण मानते। एक कन्या के आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेने पर वे इतने खुश होते कि जैसे इन द्वारा अब भारत के सौ व्यक्तियों के मनोस्थल से तो आसुरियता नष्ट होनी ही है। अत: शायद पिताश्री ही संसार में साकार रूप में एक ऐसे पिता अथवा पितामह थे जो अधिक से अधिक ज्ञान-पृत्रियाँ होने से खुश होते थे। उनके लिए “कन्या’ शब्द ही पवित्रता एवं शक्ति का पर्याय था। ज्ञान-युक्त एवं सुशील कन्याओं के प्रति उनका इतना स्नेह और सम्मान होता था कि वे दिव्यतायुक्त पुरुषों के लिए भी कई बार सहसा ‘हे बच्ची’ ऐसा कहकर संबोधन करते थे।

माताओं का सेवक

बाबा कन्याओं-माताओं का सदा सम्मान करना सिखाते थे तथा ज्ञान सुनने वाली माताओं को बाबा कहते – इनका मर्तबा (स्थान) उच्च बनाने के लिए ही तो शिवबाबा आये हैं क्योंकि बहुतकाल से इन पर बहुत सितम होते रहे हैं और समाज में इनका अपमान तथा तिरस्कार भी होता आया है परंतु अब इनके कारण मुझे भी बीच में शिवबाबा से यह ज्ञान सुनने का अवसर मिल जाता है।’ देखिये तो बाबा कितनी नम्रतापूर्वक स्वयं को गुप्त करके माताओं-बहनों को प्रत्यक्ष करने की कोशिश करते। कभी वे कहते कि माताओं-कन्याएँ तो मुझसे भी अधिक प्रवीण हैं क्योंकि वे भिन्न-भिन्न संस्कारों और योग्यताओं वाले मनुष्यों को ज्ञान देती हैं और भाषण करती हैं। यही वास्तव में पतित-पावनी गंगायें हैं। वे कहते – “इन कन्याओं- माताओं को ज्ञान-कलश देने ही तो शिवबाबा आये हैं। इन माताओं को “वन्दे मातरम्‌’ कहना चाहिए।’ इस प्रकार, वे माताओं का मान करके उन्हें सहारा देने के निमित्त बने और उनका स्थान ऊँचा करने के लिए उन्होंने स्वयं को अप्रत्यक्ष किया। वे सदा कहते – “मैं तो इनका सेवक हूँ।’ माताओं को सहारा देने के कारण उन्हें लोगों की इतनी आलोचनायें सुननी पड़ीं, इतने कष्ट भी सहन करने पड़े परंतु इसके लिए उन्होंने सब-कुछ किया।

कन्याओं-माताओं को सर्वस्व समर्पित

यदि गहराई से विचार किया जाये तो महिलाओं को समाज में उचित मान दिये जाने, उन्हें उचित अधिकार मिलने और उनकी जागृति के लिए संगठन बनाने की ओर बाबा ने जो कदम लिये, वे अपनी प्रकार के अनूठे थे, वैसे कदम उससे पहले किसी ने नहीं उठाये थे। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि बाबा ही सबसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अपना सर्वस्व कन्याओं-माताओं का एक ट्रस्ट (न्यास) बनाकर उसको समर्पित कर दिया। पिताश्री को कन्याओं-माताओं का अपमान असह्य था। जब वे जवाहरात का व्यापार करते थे तब यद्यपि वे श्रीनारायण के अनन्य भक्त थे तथापि वे चित्रों में दासी की तरह श्रीलक्ष्मी को विष्णु के पाँव दबाते हुए नहीं देख सकते थे। अत: वे चित्रकार को विशेषतया बुलाकर चित्र का यह भाग बदलवा देते थे। वे प्रायः विनोद-भरे स्वर में कहा भी करते थे कि ‘मैं चित्रकार से कहकर श्रीलक्ष्मी को इस सेवा से मुक्त करा देता था।’

अब नारियों द्वारा ही ‘ओम्‌’ की अग्रध्वनि

पिताश्री के मुखारविन्द द्वारा जब शिवबाबा की ज्ञान-सरिता स्त्रवित हुई तब नारी का तिरस्कार करने रूप जो कल्मष समाज पर था, वह धुलने लगा। जो कन्यायें-मातायें पिताश्री के सत्संग में आतीं, वे ‘ओम्‌’ की ध्वनि किया करतीं और ज्ञान के गीतों द्वारा दूसरों को भी पवित्र जीवन का संदेश देतीं। इस प्रकार, संन्यासी लोग ग्रंथों की दुहाई देकर जो यह कहते चले आते थे कि नारी को ओम्‌ कहने का भी अधिकार नहीं है, बाबा ने उनके इस कथन को प्रैक्टिकल रीति मिथ्या सिद्ध कर दिया। स्वयं बाबा अपने प्रवचनों में कन्याओं-माताओं को कहा करते कि अब आप रिढ (बकरी) बनना छोड़ो और शेरनी बनो। बाबा ने उन्हें समझाया कि स्त्री रूप तो प्रकृति (अर्थात्‌ देह) का है, आप तो पुरुष (आत्मा) हो; क्षेत्र नहीं हो, क्षेत्रज्ञ हो। अत: भय को छोड़ो और देही-अभिमानी तथा अभय बनो। बाबा ने उनके लिए सिलाई और पढ़ने-लिखने की भी व्यवस्था की। बाबा ने एक-दो बहुत बड़े भवन भी इस कार्य में लगा दिए थे ताकि उनका बौद्धिक विकास हो और साथ-साथ वे आत्मनिर्भर हो सकें। उनके लिए स्वयं बाबा ने बहुत-से गीत भी बनाये जोकि वहाँ सभा में गाये जाते थे। उनमें से एक गीत ऐसा भी था जिसमें यह बताया गया था कि जो कानों में इतनी सारी बालियाँ, हाथों में इतनी सारी चूड़ियाँ रूपी कड़ियाँ और नाक में गुलामी की नथ पहने हुए हैं, वे पिंजरे की मैना हैं। आज़ाद वे हैं जो फैशन, बनावट व सजावट इत्यादि से मुक्त हो सादगी, त्याग, तपस्या और आत्मनिर्भरता का जीवन अपनाते हैं।

माता गुरु द्वारा होगा उद्धार

बाबा उन्हें प्रेरणायें देते कि जगत की माताओं और कन्याओं, अब जागो और ज्ञान की ललकार करो। तुम्हारे द्वारा ही जगत का कल्याण होना है। जब माता गुरु बनेगी, तब ही भारत की संतानों का उद्धार होगा। तुम्हारे कारण ही भारत का उत्थान रुका है। तुम केशों का श्रृंगार करने में लगी हो और उधर भारत माँ के लाल ज्ञान के बिना विकारों में ग्रस्त हैं, आसुरियता से संत्रस्त हैं और दुख तथा अशान्ति से कराह रहे हैं। कितनी ही कन्याओं-माताओं ने उनकी इस चुनौतीपूर्ण, प्रेरणादायक ध्वनि से जागृत होकर राजऋषि अथवा राजयोगिनी के आसन को ग्रहण किया और अपने केश खोलकर मन में अपने-आप से यह प्रतिज्ञा की कि अब हम अपने आपको पाँच विकारों से मुक्त करके ही दम लेंगी और भारत-भूमि पर निर्विकारी स्वराज्य स्थापित करके ही रहेंगी। बाबा की उन्हीं शिक्षाओं व प्रेरणाओं का ही मधुर फल है कि आज ब्रह्माकुमारी बहनों-माताओं का इतना बड़ा शक्तिदल भारत को पवित्र बनाने में लगा है।

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