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Brahma baba with others - 6

जीवन चरित्र में सदगुणों के दर्शन

प्रसन्नचित्त

    • यह घटना जून 1956 की है| जब बाबा की शारीरिक आयु 78 से 79 वर्ष की होगी| अनायास ही बाबा को एक शारीरिक व्याधि ने आ घेरा| आबू के स्थानीय डॉक्टर एवं सिविल सर्जन ने कहा कि पिताश्री को तुरंत ही मुंबई ले जाया जाए| वहाँ बड़े -बड़े अस्पताल है और इलाज की सुविधा भी आधुनिक तथा अच्छी है| गंभीर मुद्रा बनाकर और कुछ चिंता-सी प्रकट करते हुए डॉक्टर महोदय ने कहा कि इसके इलाज के लिए बाबा को ऑपरेशन कराना पड़ेगा| उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा ऑपरेशन 78 वर्ष की आयु में बहुत कम ही लोगों का सफल होता है| डॉक्टर की ऐसी बातें सुन-सुन कर बच्चों के मन में कुछ सोच विचार चल पड़ा| बाबा के प्रति अति अलौकिक स्नेह के कारण यज्ञ व॒त्सों का मन कुछ भर आया था| परंतु जब यज्ञ वत्स बाबा की ओर देखते थे तो आश्चर्यचकित रह जाते थे! बाबा के चमकते हुए चेहरे पर अस्वस्थता का अथवा कष्ट के कोई चिह्न ही नहीं मिलते थे; केवल और केवल प्रसन्नता ही दिखाई पड़ती थी| हर विकट परिस्थिति का प्रसन्नमुद्रा से सामना करना यह बाबा के जीवन की विशेषता थी|
    • एक समय की बात है कि जब समाज में एक ब्राह्मण को यदि कोई बड़ा यजमान अपने साथ जाने के लिए आग्रह करे तो ब्राह्मण को विवश होकर जाना ही पड़ता था| साकार बाबा बताया करते थे कि कुछ इसी तरह मैं भी अपने गृहस्थ और जवाहरात के व्यापार के जीवन में, अपनी मस्ती में जी रहा था कि शिवबाबा जोकि सबसे बड़ा यजमान है, उसने मुझे बुला लिया, इस ईश्वरीय मार्ग पर मुझे लगा दिया और मेरे तन में प्रवेश होकर मुझसे कार्य लेने लगे! मैं उनको कुछ कह भी ना सका! मैं तो ब्राह्मण की तरह विवश होकर फँस गया! रास्ते चलते यह ब्राह्मण फँस गया! विनोद के स्वर में, बाबा यह बात इस भाव से कहते थे कि लोग मुझसे बिगड़ते हैं कि मैं पवित्र बनने के लिए क्यों कहता हूँ? परंतु वे यह नहीं समझते कि मैं स्वयं भी कहावत के ब्राह्मण की तरह फँस गया हूँ! सारा खेल तो वास्तव में शिवबाबा ने किया है! इस प्रकार, बात अनुकूल हो या प्रतिकूल, बाबा सदैव रमणीक और प्रसन्नचित्त रहते थे|

 

गुणग्राहकता

    • दादी रतनमोहिनी जी सुनाती हैं कि बाबा की यह बहुत बड़ी विशेषता थी कि बाबा ने जो भी कहा, हमें उसी समय उसको करना है| क्योंकि अगर नहीं करते तो बाबा कहते थे कि बच्चे फेल हो गए| बाबा उस दिन की मुरली में जो काम अथवा सैवा देते थे हमें उसी दिन करना ही होता था क्योंकि अगले दिन फिर बाबा पुछते थे कि कल जो बाबा ने होमवर्क दिया था किसने किया, हाथ उठाओ। जो बच्चा कोई भी सेवा करता था, भले वो समझाने की हो अथवा लिखने की हो, उसको बाबा क्लास में सुनाने के लिए कहते थे| उस बच्चे को आगे बढ़ाने के लिए, उसमें उमंग उत्साह भरने के लिए क्लास में उसकी महिमा करते थे| बाबा उनसे कहते थे कि तुमने बाबा की आज्ञा का पालन किया है, तुम फरमानबरदार बच्चे हो| इस तरह बाबा बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए उनके गुणों को पहचान लेते और उनकी विशेषताओं को बाहर लाते हुए उसको सेवा में लगाते|
    • नडियाद की पूर्णिमा बहन सुनाती हैं कि जब हमारा मधुबन जाना हुआ तब क्लास के बाद बाबा से हमारा व्यक्तिगत मिलना हुआ| तब बाबा ने मुझे कहा, बच्ची, पढ़ाई पढ़कर क्या करोगी? तुम्हें पढ़ाई छोड़कर बाबा की सेवा में लग जाना है| (बाकी कन्याओं को लौकिक पढ़ाई पढ़ने को कहा) स्वाभाविक था कि कन्याओं को भी प्रश्न उठा कि बाबा ने ऐसा क्यों कहा! फिर बाबा ने मुझे कहा, बच्ची, तुमको यहाँ से जाकर सीधा सेंटर पर ही ठहरना है, जाने से पहले बाबा से छुट्टी लेकर जाना| जाने का दिन समीप आया।| बाबा के पास जब मैं छुट्टी लेने गई, तब बाबा अपने कमरे मैं कुर्सी पर बैठे थे| मैंने बाबा को कहा, बाबा मैं दमयंती बहन के साथ जा रही हूँ, आप से छुट्टी लेने आई हूँ। बाबा ने मेरा हाथ पकड़ा, फिर सिर पर हाथ घुमाकर प्यार भरी दृष्टि देते हुए कहा, बच्ची, तुम्हारा नाम क्या है? मैंने कहा पूर्णिमा| बाबा ने कहा, बच्ची, तुम पूर्ण माँ हो, तुम छोटी कन्या नहीं हो, तुम तो जगत माता हो। तुम्हें सभी की माँ बनकर सभी का कल्याण करना है| इसीलिए अब तुम्हें बाबा की सेवा में ही लग जाना है| इस तरह बाबा बच्चों के गुणों को पहचानकर उनको सेवा में लगाते थ|

 


 

खुशी

    • कईयों के जीवन में परिवर्तन लाने के बाद बाबा एकांत के लिए कश्मीर चले गए| जब बाबा कश्मीर में थे तो उनके कुछ मित्र संबंधी तथा अन्य माताएं-कन्यायें जिनमें आत्म जागृति आई थी, वह बाबा के साथ पत्र व्यवहार करते रहे| बाबा एक दिन एक माता के नाम पत्र भेजते तो दूसरे दिन दूसरे के नाम पर| जिनके नाम पर पत्र आता, वह बहुत ही हर्षित होती थी और दूसरों को भी वह पत्र सुना-सुनाकर अतींद्रिय सुख देती थी| वह उस पत्र को एक अनमोल निधि मानती थी और उसमें लिखित शिक्षाओं को अपने जीवन में अपनाने का भरसक प्रयत्न करती| बाबा के खत द्वारा मिली हुई खुशी में वे गोपिकायें कभी-कभी प्रेम के आँसू बहाती, तो उसको बार-बार पढ़कर असीमित आनंद का अनुभव करती रहती थीं|
    • एक बार की बात है कि बाबा के पास कमरे में कुछ बच्चे बैठे थे| बाबा बोले, बच्चों मेरे कमरे में आप सभी बच्चों की अवस्था को देखने का मीटर लगा हुआ है| सभी बच्चे कमरे में इधर-उथर देखने लगे और सोच में पड़ गए कि मानसिक अवस्थाओं को देखने के लिए कोई स्थूल मीटर कैसे हो सकता है! जब उन्हें किसी तरफ कुछ भी दिखाई नहीं दिया तब बाबा बोले, बच्चे, वह मीटर इस रेडियो में लगा हुआ है (उन दिनों बाबा प्रतिदिन रेडियो पर खबरें सुना करते थे) तब सबको आश्चर्यवकित और मुस्कुराता हुआ देख बाबा ने कहा, बच्चे जब मैं प्रतिदिन खबरें सुना करता हूँ तो उन द्वारा बच्चों की अवस्था को भी जान जाता हूँ। अगर लड़ाई तेज हो गई हो, अथवा उसकी तैयारी जोरों पर हो, साइंस का चमत्कार हो रहा हो, तो मैं समझ जाता हूँ कि बच्चों का आध्यात्मिक पुरुषार्थ भी तेज हो रहा है| अगर समाचार ठंडा हो तो समझ जाता हूँ कि आजकल बच्चों की अवस्था भी ढ़ीली चल रही है| बाबा की यथार्थ बात को सुनकर सभी हंस पड़ते थे| बाबा पुरुषार्थ की बातों को ऐसे सरल और विनोद पूर्ण रीती से वर्णन करते थे|

 


 

दृढ़ता

    • भविष्य के ज्ञाता बाबा ने एक बड़ा अच्छा नियम बनाकर रखा था कि जो भी मातायें- कन्यायें सत्संग में आना चाहती हैं वे अपने माँ-बाप, दादा-दादी, सास-ससुर से चिट्ठी लेकर आए कि हम खुशी-खुशी से अपनी बच्ची को अथवा अपनी बहू को ओम मंडली में ज्ञानामृत पीने और पिलाने की छूट्टी दे रहे हैं| चिट्ठी ले आने के बिना बाबा किसी को भी ओम मंडली में रहने की छुट्टी नहीं देते थे| इस प्रकार बाबा जो नियम बनाते थे उसका हढ़ता पूर्वक पालन करते और करवाते थे|
    • बेगरी पार्ट चल रहा था और होली के दिन नजदीक थे। एक दिन बाबा ने मम्मा से कहा, मम्मा, होली आ रही है, बच्चों को जलेबी खिलानी है”| मम्मा ने बाबा को कहा, “जी बाबा, लेकिन यज्ञ में ना तेल है, ना आटा है” बाबा बोले, “सेठ ऊपर बैठा है, हम तो बीच में हैं| अगर जलेबी खिलानी होगी तो वह खिलाएगा”| होली के दिन नजदीक आ गए, बाबा ने पुनः कहा, “मम्मा, कल होली है, बच्चों को जलेबी खिलानी है”| तो मम्मा ने कहा, “जी बाबा, बाबा ने कहा है तो जरूर होगा” इन्हीं दिनों में आबू में एक युगल कुछ दिन से आपस में बात कर रहे थे कि कुछ दान देना है| उसी रात पति को स्वप्न में विष्णु जी आए और बोले, “उठो! यज्ञ में दान करके आओ”| इधर मम्मा होली के दिन बच्चों को बाहर पहाड़ी पर ले जाने के लिए तैयार होकर आई, तो उधर वह माता आती हुई दिखाई दी| उस माता ने एक लिफाफा मम्मा को अर्पण किया! माता के जाने के बाद मम्मा ने लिफाफा खोला तो देखा कि उसमें इतना पैसा था जो एक सप्ताह तक यज्ञ का कारोबार चल सकता था| बाबा ने कहा कि, “बच्ची, आज तो जलेबी बनाकर बच्चों को खिलाना ही है!” इस प्रकार बाबा के दृढ़ संकल्प ने अनहोनी को भी होनी कर दिया|

 


 

ईमानदारी

    • ब्रह्मा बाबा की शारीरिक आयु 60 वर्ष की थी, और यज्ञ की स्थापना के समय पर कई विघ्नों के तूफान उठ खड़े हुए, जिसका सामना करने में भी वे अकेले ही थे| शहर के मुखिया लोगों ने उन पर दबाव डाला कि या तो वह सत्य को छोड़ दें या उसमें मिलावट करके उससे dilute कर दें (हल्का कर दें)| परंतु बाबा सत्य के मार्ग पर अडिग रहे| ऐसे समय में मित्रों ने उनका साथ छोड़ दिया परंतु स्वयं उन्होंने सत्य का साथ नहीं छोड़ा| जो बात जान ली, पहचान ली, मान ली उसे उन्होंने सच्चाई से पकड़े रखा| धरत परिये, धर्म न छोड़िये, इस उक्ति के अनुसार उन्होंने धमकियां और धमाकों का सामना किया, परंतु सत्य से मुंह नहीं मोड़ा| उन्होंने अमानत में खयानत नहीं की, सत्यता मैं असत्यता का जरा भी समावेश होने नहीं दिया और धारणाओं तथा नियमों में ढ़ील नहीं दी|
    • जब बाबा हैदराबाद से कराची शिफ्ट हुए, तो जो पूरे परिवार सहित ज्ञान में चलते हों, ऐसे 8-10 पूरे परिवार भी बाबा के साथ कराची चले गए| बाकी जो ज्ञान में चलने वाले अकेले भाई या बहन थे, वह हैदराबाद में रह गए| ऐसे में चंद्रहास दादा को संकल्प आया कि हम बाबा से मिलने कैसे पहुंचे? क्योंकि ज्ञान अमृत के बिगर उनसे रहा नहीं जाता था| एक दिन वे स्वयं ही छिपकर कराची पहुंच गए| कुछ कन्याएं माताएं भी छोटा छोटा ग्रुप बनाकर छिपकर कराची जाने लगे| जो कराची आते बाबा उनके परिवार वालों को तार भेज देते थे कि आपका बच्चा उनके पास पहुंच गया है| ऐसे बाबा बड़े कायदे और ईमानदारी से चलते थे|

 


 

सुंदरता

    • जर्मनी की सुदेश दीदी सुनाती है: 1957 में बाबा दिल्ली मैं आए थे| उस समय मुझे पहचान नहीं थी कि बाबा कौन है? मैं अपनी मौसी के साथ सत्संग में गई तो मैंने देखा सब ध्यान में बैठे हैं| मैं भी वहाँ आंखें बंद करके लौकिक रीति सै ध्यान में बैठ गई| मुझे लगा कि जब महात्मा जी आयेंगे तो सब नारा लगायेंगे तब मैं आंखें खोल टूँगी| इसी बीच, बाबा शांति से आकर संदली पर बैठ गए,और मुझे पता ही नहीं चला! जब अचानक मैंने आँखें खोली, तो बाबा सामने बैठे हुए थे! मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ, कि महात्मा जी कब आ कर बैठ गए! जैसे ही मेरी दृष्टि बाबा पर पड़ी, तो बाबा लाइट ही लाइट दिखाई पड़े| मैंने समझा कि शायद यह सूर्य का प्रतिबिंब होगा| मेरे से आगे थोड़ी जगह खाली पड़ी थी, मैं वहाँ जाकर बैठ गई| वहाँ भी वही दृश्य! बाबा के चारों तरफ लाइट ही लाइट दिखाई पड़ी! उस समय मुझे यह मालूम नहीं था कि यह बाबा का फरिश्ता स्वरूप है लेकिन वह प्रकाश का रूप बहुत सुंदर था, मनभावन था| वह इतना आकर्षक था जो मन करता था कि उसको देखते ही रहें|
    • मुजफ्फरपुर की पुष्पाल दीदी सुनाती हैं कि जब मैं पहली बार साकार बाबा से मिलने 1955 में आबू पहुँची, उस समय आश्रम धौलपुर हाउस में था| मैं तैयार होकर बाबा से मिलने गई, तो बाबा को देखते ही दिव्यता और अलौकिकता नजर आई| मुझे ऐसा लगा कि ऐसा दिव्य व्यक्तित्व दुनिया में कहीं है ही नहीं! ऐसा दिव्य रूप मैंने जिंदगी में कभी देखा ही नहीं था! विचित्र, रूहानी कशिश थी! मुझे ऐसा अनुभव हुआ कि यह बाबा ऊपर से उतर आए हैं, वे इस दुनिया के नहीं है| साथ-साथ मैं बाबा को देखते-देखते किसी दूसरी दुनिया में ही चली गई जहाँ आनंद ही आनंद था|

 


वफादार

    • ब्रह्मा बाबा का मुंबई में ऑपरेशन होना था| डॉक्टर ने यह कह दिया था कि ऑपरेशन के बाद बाबा को रक्त देना जरूरी होगा| जब बाबा को यह मालूम हुआ, तो बाबा ने इसके लिए मना कर दिया क्योंकि बाबा अब इस प्रभु-अर्पित शरीर में किसी भी अन्य व्यक्ति के रक्त का समावेश करवाना ठीक नहीं मानते थे| उन्हीं दिनों संतरी बहन भी बाबा के साथ ही गई हुई थी और उन्होंने शिवबाबा को ध्यान-अवस्था में यह संदेश दिया| तब शिवबाबा ने यह संदेश भेजा कि मेरे साकार रथ को कहना कि मैं स्वयं ही रक्त का शुद्धिकरण करूँगा, इसलिए वे इस बात को स्वीकार कर ले| तब साकार बाबा ने शिव बाबा का संदेश मान लिया|
    • यज्ञ में एक नई चित्र प्रदर्शनी बनी थी, जो कोलकाता में लगाई गई थी| अहमदाबाद से कुछ माताओं ने कोलकाता जाकर प्रदर्शनी देखी| सेवा देखने के बाद उन्होंने बाबा से कहा कि, “बाबा, प्रदर्शनी बहुत अच्छी है, हमारे यहाँ भी होनी चाहिए” उस समय उन माताओं के यहाँ सेंटर नहीं था, वे भिन्न-भिन्न स्थान पर एकत्रित होकर सत्संग करती थीं| बाबा के डायरेक्शन अनुसार माताओं ने मिलकर प्रदर्शनी की जगह का सारा प्रबंध किया| सभी ने अपने धन के सहयोग से धूमधाम से 45 दिन तक प्रदर्शनी चलाई जिसका समाचार रोज बाबा को सुनाते थे| जब प्रदर्शनी पूरी हो गई, उसके बाद सबको सौगातें भी दी गयी| सारा खर्च हो जाने के बाद भी बहुत पैसा बच गया, तो बाबा से पूछा, “बाबा, पैसा बहुत बचा है, क्या करें?” तो बाबा ने डायरेक्शन दिया कि, “बच्ची, अपने यहाँ ही एक सेंटर खोल दो” इस प्रकार बाबा धन के उपयोग में बहुत ही वफादार थे|

 

संतुष्टता

    • चंद्रहास दादा सुना रहे थे कि हम 3 वर्ष कोटा हाउस में रहे फिर राजस्थान सरकार ने मकान खाली करने का निर्देश दिया| फिर सन 1958 में हम पोखरान हाउस में आए, जिसे अभी पांडव भवन के नाम से जाना जाता है| यह पुराना मकान तो छोटा था लेकिन इसमें जमीन बहुत थी| बाबा ने वहाँ धीरे-धीरे मकान बनवाने शुरू किए| मैं इंजीनियरींग तो नहीं जानता था लेकिन बाबा जैसे मुझे डायरेक्शन देते थे, ऐसे अनुभवों से सीखता गया और मकान बनने लगे| पहले छोटा हिस्ट्री हॉल और साथ के दो कमरे बनाए| यह इस लक्ष्य से बनाये कि एक में बाबा और एक में मम्मा रहेगी| लेकिन जब मकान तैयार हुए तो बाबा ने वहाँ रहने से ईंकार कर दिया, और कहा, “बाबा तो पुराने मकान में ही रहेगा जब शिव बाबा भी पुराने रथ में आते हैं, तो ब्रह्मा बाबा कैसे नए मकान में रहेगा!”
    • बाबा के त्याग का तो क्या वर्णन करें! एक झटके से ऐसा अमीर जीवन त्याग, सब कुछ माताओं को समर्पण कर दिया! बाबा ने पांच अनन्य माताओं की कमैटी बनाई जिसकी मुखिया ओम राधे थी| सारी चल-अचल संपत्ति उनके नाम विल कर दी, फिर त्यागमूर्त बाबा जो हम बच्चे खायें, पहने वही बाबा भी खायें तथा पहने| इतने तक कि यदि कुर्ता फट जाए, तो भी आग्रह करते कि इसको चत्ति लगा दो| अभी तो हम त्यागी, तपस्वी हैं, शिवबाबा भी तो पुराने शरीर रूपी वस्त्र धारण करते हैं| इस शरीर रूपी वस्त्र को भी चत्तियां लगती रहती है, तो मैं चत्ति वाले वस्त्र क्यों नहीं पहन सकता? इस प्रकार वास्तविक अविनाशी ख़ज़ाने प्राप्त करने के संतोष ने बाबा की जीवन को सरल बनाया|

 

क्षमाशील

    • जो लोग कुछ समय तक ज्ञान लेते रहने के बाद किसी न किसी परिस्थिति अथवा मन की चंचलता के कारण ज्ञान छोड़कर चले जाते, उनके बारे में भी बाबा कहते कि बच्चे फिर-फिर उन लोगों के पास जाकर उन्हें आलस्य अथवा अज्ञान की निंद्रा से कोई जगाता रहे| बाबा कहते कि ईश्वरीय ज्ञान को छोड़कर वे बिचारे कहाँ जायेंगे? उनका कल्याण कैसे होगा? भले ही आज वे माया से प्रभावित होकर अथवा अपने किसी पूर्व संस्कार वश इस अनमोल ईश्वरीय खजाने से लाभान्वित नहीं होते, परंतु आप द्वारा संदेश, स्मृति, चेतावनी, निमंत्रण आदि मिलते रहने पर कभी न कभी वे इस कलयुगी दुखमई संसार से ठोकर खाकर जाग ही जायेंगे| इस तरह बाबा उन बच्चों पर भी सदा क्षमाभाव बनाए रखते थे|
    • गंगे दादी अपना अनुभव सुनाती हैं कि शुरू से ही बाबा ने हम बच्चों को सिखाया कि बच्चे, चैरिटी बिगिंस एट होम| बाबा ने सदैव परिवार वालों से तोड़ निभाना सिखाया| शुरू में मुझे परिवार वालों का साथ सहयोग नहीं था| एक बार बाबा ने मुझे कहा बच्ची, अपने माँ-बाप को बाबा से मिलने ले आओ।| बहुत मेहनत करने के बाद, आखिर अपने माता पिता को मना कर मैं उनको एक सप्ताह के लिए बाबा के पास ले आई| जब उन्होंने बाबा को देखा, हमारी दिनचर्या को देखा, हमारा रहन-सहन देखा तो मैरी माँ ने सभा में ही खड़े होकर बाबा से माफी मांगी कि, “बाबा, मुझे माफ कर दो, मेंने इस बच्ची को बहुत कष्ट दिए, मुझे माफ कर दौ”, तो क्षमा के सागर बाबा ने कहा, “बच्ची, इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं| तुमने अपना पार्ट बजाया, उसने अपना पार्ट बजाया”| इस तरह बाबा स्वयं क्षमाशील रहकर बच्चों में भी यह गुण भरते थे|

 


प्रेम

    • लंदन की जयंती बहन सुनाती हैं, कि एक दिन मैं मधुबन में रात्रि क्लास में बैठी थी| बाबा ने क्लास में ही पूछा, बच्ची, कुछ चाहिए? अगर कोई भी चीज की जरूरत हो तो बाबा से ले सकती हो| बाबा के यज्ञ में सब कुछ है| जो चाहे बाबा से लेना| मुझे ऐसा ही लगा कि जैसे एक माँ छोटे बच्चों को संभालती है, ऐसे बाबा का ममतामई माँ जैसा स्रेही स्वरुप भी हमने देखा| लखनऊ सेवा केंद्र की भगवती बहन सुनाती हैं कि कराची से मधुबन आने पर उन्हें बाबा ने कपड़ों का स्टॉक संभालने की सेवा सौंप दी| उन्हें सेवा का सौभाग्य तो बाबा ने दिया ही, साथ-साथ यह भी कहा कि, “बच्ची, कभी किसी को कुछ चाहिए तो उसे दे देना, उसे ना नहीं कहना” अपने इस कथन की व्याख्या में बाबा ने उन्हें समझाया, “देखो, यहाँ जो भी बच्चे रहते हैं, वे समर्पित हैं| उन सभी का बाबा पर हक है, अधिकार है, इसीलिए उनकी जरूरत पूरी होनी चाहिए|”
    • जगदीश भाई बाबा के प्रेम की पराकाष्ठा सुनाते हुए अपना अनुभव कुछ इस प्रकार लिखते हैं: एक बार की बात है कि बाबा दिल्‍ली राजौरी गार्डन में ठहरे हुए थे| शिवरात्रि में केवल 4 या 5 दिन रहते थे| प्रातः मुरली में बाबा ने मनुष्य मत और ईश्वरीय मत में महान अंतर की बात कही| क्लास के बाद बाबा बोले, “बच्चे, मनुष्य मत और ईश्वरीय मत पर एक पुस्तक लिखकर, उसे झटपट छपवा कर सब सेवाकेंद्रों पर भेज दो| बोलो बच्चे, कब तक छप जाएगी?’ मैंने कहा, “बाबा, कोशिश करूंगा, एक हफ्ते में तैयार हो जाए|” इस पर बाबा ने कहा, “कोशिश भी नहीं, और एक हफ्ता भी नहीं| यह तो शिवरात्रि पर सबको बाँटनी होगी”| मैंने कहा, “बाबा, किताब कितने पेज की हो?” बाबा बोले, “यह आप जानो, परंतु उसमें मनुष्य मत और ईश्वरीय मत की सभी मुख्य बातों का अंतर आ जाना चाहिए| मैं सोचने लगा कि चार-पांच दिन ही तो रहते हैं! परंतु मन में यह भी भाव था कि बाबा ने कहा है तो होना है जरूर; हिम्मते मर्दा, मदद-ए-खुदा! मैंने रात-दिन लगाकर हिंदी में मूल लेख तैयार किया और प्रेस में ही बैठकर अंग्रेजी में अनुवाद कर करके देता गया| भाई विश्वरतन जी भी 2-3 रात लगातार वहाँ छापेखाने में ही प्रूफ़ आदि देखते रहे| आराम और भोजन को छोड़कर, हमारी और समय की दौड़ लग गई, जिसमें हमारी सफलता निश्चित ही थी! 64 पेज की हिंदी और 64 पेज की अंग्रेजी की बड़े पृष्ठ वाली दो किताबें छप कर तैयार हो गई! परंतु दिनचर्या में हेरफेर से, आराम ना करने से और प्रेस में ठंड लग जाने से काम समाप्त होने के दूसरे दिन मुझे लगभग 104 डिग्री बुखार हो गया मैं सेवा केंद्र में थोड़ा आराम करने के विचार से लेट गया| मैं वहाँ अकेला ही था, अन्य सभी भाई-बहन रजौरी गार्डन सेवाकेंद्र पर बाबा के पास गए थे| अचानक से सेवाकेंद्र के द्वार की घंटी बजी| मैंने उठकर दरवाजा खोला, तो यह देखकर आश्चर्य की कोई हद ना रही कि भाई विश्वकिशोर के साथ बाबा स्वयं आए हैं! बाबा को मिलकर मेरी सारी थकान दूर हो गई।| मैंने सोचा बाबा ने जितनी जल्दी छपाने के लिए की थी, उससे भी ज्यादा जल्दी इस बच्चे को आकर प्यार देने के लिए की! छपाई के लिए तो बाबा ने 4 दिन दिए थे और प्यार देने में 4 दिन की भी देर नहीं की!

 


उत्साह

    • कई बार बाबा कहा करते, “वत्सों, जब किसी के घर शादी का मौका होता है तो उनके घर में ढ़ोल या बैंड बजते हैं| अब बाबा तो कई बार सोचता है कि यहाँ 24 ही घंटे खुशी के नगाड़े बजते रहे, क्योंकि यहाँ तो आत्माओं की परमात्मा से सगाई अथवा शादी हो रही है| जब यहाँ प्रतिदिन 24 घंटा नगाड़े बजेंगे तो लोग आश्चर्यचकित होकर पूछेंगे कि. क्या बात है यहाँ रोज ही नगाड़े क्‍यों बजते हैं? तब प्रश्न कर्ताओं को बताया जाए कि यहाँ आत्माओं की परमात्मा से सगाई होती है; इससे बढ़कर अन्य कोई खुशी की बात नहीं हो सकती| इस प्रकार बाबा खुशी और उत्साह के एक साकार पावर हाउस थे|
    • चन्द्रहास दादा सुनाते हैं कि हमने प्यारे बाबा के चरित्रों में देखा कि कैसे हम बच्चों से बच्चा बन खेल पाल भी करते तो पहाड़ों पर घूमते फिरते हुए हमारे साथ सखा का पाठ प्रैक्टिकल भी बजाते| कभी कोई स्थूल सेवा भी सामने आती तो पहले खुद ही तगारी उठाते व गेती चलाते| ऐसे बुजुर्ग बाबा को सभी कार्यों में हाथ बढ़ाते देख आनेवाले भाई- बहनों में भी उत्साह जाग उठता और वह खुद भी सैवा में लग जाते|

शान्ति

    • एक बार जब बाबा अपने जवाहरात के व्यापार केंद्र में अपनी गद्दी पर बैठे जवारातों की पुड़िया का मूल्यांकन कर रहे थे, तो उन्हें अचानक ही कहीं जाना पड़ा| दादा अपनी जवाहरातों की पुड़िया यूँ ही खुली छोड़कर वहाँ से निकल गए| उस दिन अचानक ही एक सोनार अपने छोटे बच्चों के साथ बाबा से आर्डर लेने उनकी दुकान पर आए थे| बाबा की अनुपस्थिति में उस सोनार के बच्चों ने उस खुली पुड़िया में हीरे देखें, तो कुछ हीरे उठाकर ले लिए| कि अक बाबा पुनः लौटे तो उन्होंने यह तुरंत ही जान लिया कि कुछ हीरे कम हैं| उन्हें अपने कार्यकर्ताओ में पूर्ण विश्वास था, इसीलिए शांति और धैर्यतापूर्वक उन्होंने सिर्फ इतना ही मालूम किया कि उनकी अनुपस्थिति में कौन- कौन दुकान पर आए थे? बस! फिर तो बाबा सोनार के घर ही पहुँच गए! वहाँ सोनार के छोटे बच्चे को बुलाया और उसे स्रेहभरी शांत आवाज़ में कहा कि मीठे बच्चे, तुम्हारे बड़े भाई ने कहा है कि जो हीरे तुम दोनों मिलकर मेरी ठुकान से ले आये थे, वह मुझे वापस दे दो! यह सुनते ही वह बच्चा हक्का-बक्का रह गया और उसने हीरे लौटा गा इस प्रकार बाबा हर परिस्थिति में शांति को अपने व्यवहार का आदर्श बनाये रखते |
    • निर्मलशांता दादी ने अपना अनुभव सुनाया कि: एक बार की बात है, हम बच्चे बाबा की दुकान से कुछ हीरे उठा कर खेलने के लिए ले आए| हमारे लिए तो ये खेलने के कांच के बॉल के समान थे! खेल-खेल में तो शायद हमसे यह गुम भी हो जाते! जब बाबा को इस बात का पता चला तो वह मूल्यवान रत्न हमसे जबरदस्ती लेने की कोशिश न करते हुए, शांति व स्रेह से कहने लगे कि “बाबा ने यह हीरे तुम्हारे लिए ही तो रखे हुए थे! बाबा तुम सबको इनकी एक-एक अंगूठी बनवा कर देंगे, तुम्हारे हाथों में बहुत सुंदर लगेगी|” बस फिर तो क्या था, अंगूठी के प्रलोभन में हमने वो हीरे जल्दी से ला कर बाबा को दे दिए| फिर बाबा ने हम सबको उन हीरो में और हीरे मिलाकर अंगूठी बनवा कर दी| इस प्रकार बाबा स्नेह व शांति से सभी काम करते थे|

 


दयालु

    • एक बार एक भाई ने अपना अनुभव सुनाया कि बाबा ने उसे मधुबन में रात को पहरा देने के लिए कहा| वे पहरे पर ही था कि अर्थरात्रि के बाद लगभग 2:00 बजे बाबा अपने कमरे से बाहर आए और उससे कहा कि बच्चे, ऑफिस से तख्ती और पेंसिल ले आओ, प्रातः 2:00 बजे बाबा ने बैठकर एक माता को पत्र लिखा, जिसमें उसको आश्वासन दिया कि तुम्हें घबराना नहीं है, वह दिन दूर नहीं जब तुम्हारे बंधन कट जायेंगे| इसके ठीक 2 दिन बाद उस माता का भी बाबा को एक पत्र आया, जिसमें उसने लिखा कि जब उसको बाबा का पत्र मिला, उसकी पिछली रात को उसने शारीरिक व्याधि में बाबा को बहुत प्यार से याद किया था| इस सच्ची याद से बाबा की नींद खुल गई थी और अपने आराम को न देखते हुए बाबा ने उसके प्रति वह पत्र लिखा| ऐसे करुणा के सागर बाबा को नींद में भी बच्चों को पुकार सुनाई देती थी और बाबा उनको सकाश देते थे|
    • चंद्रहास दादा सुनाते कि एक समय था जबकि यज्ञ में फोटोग्राफी की ड्यूटी वे संभालते थे| सेंटर्स से कोई पार्टी आती थी तो भाई-बहनें उन्हें ही कहते कि हमारा बाबा के साथ फोटो निकालो, हमारी बहुत दिल है| वे जब भी बाबा को यह बात बताते तो बाबा कहते, “मैं कोई गुरु-गोसाई थोड़ेही हूँ जिसका फोटो घर में जाकर लगायेंगे? मैरा फोटो क्या करेंगे? तब चंद्रहास दादा बाबा से कहते कि आपके फोटो को देखकर इस रथ में विराजमान शिवबाबा इनको याद आएगा| इनकी दिल है, आप तो सभी की दिल लेने वाले हो ना! तब बाबा कहते अच्छा, बुलाओ बच्चों को! ऐसे ज्ञान की यथार्थ समझ के साथ-साथ बाबा बच्चों की दिल रख लेते थे|

साहस

    • यह बात सन 1955 की है| जगदीश भाई को समाचार मिला कि दादी कुमारका, दादी रतनमौहिनी और आनंद किशोर भाऊ वह एक समुद्री जहाज से चेन्नई पहुँच रहे हैं| उन दिनों जापान में हो रहे सम्मेलन से संबंधित सारे कॉरसपॉन्डेन्स और छपाई इत्यादि का कार्य बाबा ने जगदीश भाई को ही सौंपा हुआ था| जगदीश भाई ने बाबा को लिखा कि बाबा, मैरा विचार है कि जब यह भाई बहनें मद्रास में पहुँचें, तब मद्रास में एक पत्रकार सम्मेलन रखा जाये| उन दिनों यज्ञ कठोर आर्थिक कठिनाई के दौर में से गुजर रहा था| परंतु पत्र मिलते ही बाबा ने जगदीश भाई को इस पत्रकार सम्मेलन के स्वीकृति की सूचना दे दी और उसकी प्लैनिंग के लिए मधुबन बुला लिया| ऐसी कितनी कठिन परिस्थितियाँ क्यों न हो, पर बाबा ने ईश्वरीय सेवा के लिए साहसी निर्णय लिये और बच्चों में भी हिम्मत भरी, उन्हें प्रोत्साहन दिया|
    • एक बार बाबा तथा बाबा का जो लौकिक पार्टनर था (उसे बाबा प्यार से भाऊ कहते थे) रात में चौपड़ खेल रहे थे| खेलते-खेलते, बाबा को एक संकल्प आया। थोड़ी देर बाद हंसते हुए, कौड़ी फेंकते हुए, बाबा बोले, भाऊ, देखो, सोच चलता है कि इसको छोड़ हूँ” भाऊ बोले, “किसको?” बाबा बोले, “इस धंधे को! सचमुच बोलता हूँ, आप इसको संभालो|” तो पार्टनर भी बड़ी-बड़ी चीजें माँगने लगे – मुझे यह घर देंगे? बाबा कहे हाँ| मुझे यह अलमारी देंगे, जिसमें सोने-चांदी के बर्तन और ज़ेवर भरे हुए थे, बाबा बोले हाँ| मुझे यह देंगे, वह देंगे, माना भाऊ मांगता जाए और बाबा हाँ-हाँ करता जाए| ऐसा सब चीजों को देने में हाँ-हाँ करने पर भागीदार की सोच चली कि दादा का दिमाग तो ठीक है ना? रात को ऐसे बातें करते-करते सो गए| सुबह होते ही भाऊ ने दादा को कहा, “आपने जो रात को कहा था, उसे कोर्ट में जाकर पक्का लिखा-पढ़ी कर लें?” तो बाबा ने कहा हाँ, चलो! (अलिफ को अल्लाह मिला, बे को मिली बादशाही…) एक धक से बाबा ने अपना व्यापार छोड़ दिया, अपना कारोबार समेट लिया।

 


सहयोग

    • ब्रह्मा बाबा ने अपने भगीरथ पुरुषार्थ के फलस्वरूप स्वयं में सब गुणों को आत्मसात कर लिया। उन्होंने बात ही बात में अपने संपर्क में आने वालों को अपने चंदन-सम जीवन की सुगंधी दे दी, उनको पत्थर से पारस बना दिया| वे स्वयं तो महान थे ही परंतु जो भी उनके संपर्क में आया वह भी कुछ ना कुछ महानता लिए बिना वहाँ से खाली हाथ नहीं गया| शायद उस समय किसी को पता न भी चला हो कि वह क्या लेकर जा रहा है, परंतु शीघ्र ही उसे यह मालूम हो ही जाता की बात ही बात में उसे कहीं अनमोल राज राजदान ने दे ही दिया है| मौका हंसी का हो, कोई स्थूल सेवा का हो या घूमने-फिरने का बाबा ने उन सबका फायदा उठाकर अपने संपर्क में आने वालों को अपना सहयोग दे ही दिया और उन्हें प्राप्ति का अनुभव कराया|
    • सायन, मुंबई की संतोष बहन अपना अनुभव कुछ इस प्रकार सुनाती हैं: एक बार मैं किसी सैंटर पर किसी समस्या का समाधान करने गई थी| मैं जो भी करती थी, वह ब्रिजेंद्रा दादी अथवा बाबा से पूछ कर ही करती थी| मैंने उस स्थान से मुंबई फोन लगाया, बहुत कोशिश की फिर भी ब्रिजेंद्रा दादी से बात नहीं हुई| फिर मधुबन में बाबा को फोन करने की कोशिश की, वहाँ भी नहीं लगा| मैं बहुत परेशान हो गई| मुझे उस समय ऐसा अनुभव हुआ कि मैं इस दुनिया में अकेली हूँ, मुझे मदद करने वाला कोई नहीं है| मन बहुत भारी हो गया था| क्या करूँ, समझ में नहीं आ रहा था| उतने में मुझे लगा कि मेरे पास कोई आकर खड़ा हुआ है| देखा तो बाबा मुस्कुराते हुए खड़े थे! मैं आश्चर्य और खुशी से दंग रहकर बाबा को देख रही थी| बाबा ने कहा, “बच्ची, तुम अकेली कहाँ हो? बाबा तुम्हारे साथ है और सदा रहेंगे” इस प्रकार बाबा साकार में होते भी आकारी रूप में आना – जाना कर समय पर बच्चों की मदद करते थे|

 

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