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Baba with jagdish bhaiji

भगवान हमारा साथी है

हम हृदयंगम करते (दिल से कहते ) हैं कि भगवान हमारा साथी है। भगवान हमारा साथी बना, उसने कब, कैसे साथ दिया यह अनुभव सबको है। एक है सैद्धान्तिक ज्ञान कि अपने हाथ परमात्मा के हाथ में दो। उसके प्रति समर्पित हो जाओ। भगवान का भी यह वचन है कि मैं तुम्हारा साथ नहीं छोडूंगा और तुम्हें पार लगाऊंगा। इस बात को समझते हुए हम उसमें निश्चय करते हैं। दूसरी है प्रयोगात्मक बात कि यह समझने के बाद, आपके जीवन में जो-जो विकट परिस्थितियाँ आयीं, विकट समस्यायें आयीं उनमें भगवान ने आपको कैसे साथ दिया। लोग भगवद्-चरित्रों में, पौराणिक साहित्यों में भगवान के साथ का कई तरह से वर्णन करते हैं। कृष्ण ने सुदामा के साथ क्या किया? जब उसने उसको मुट्ठी-भर चावल दिये तो उसका साथ कैसे निभाया ? हम समझते हैं कि उसका भाव क्या है, उसके पीछे वास्तविकता क्या है। लेकिन मैं यह बात स्पष्ट करना चाहता हूँ कि भगवान साथ देता है। इसी तरह भगवान के जो और गुण हैं, उन सब गुणों का जीवन में अनुभव करना, इसी को ईश्वरानुभूति (God- realisation) कहा जाता है। ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त करना प्रारम्भ है, उसकी बुनियाद है, यह भी जरूरी है लेकिन ईश्वर का हरेक गुण अनुभव करना यह आवश्यक है। उससे ही उसका पूर्ण बोध होता है। उसको हम अनुभव करते हैं। हरेक बात की कोई पृष्ठभूमि (Background) होती है। उस पृष्ठभूमि को सामने रखते हुए यह जो थोड़ी-सी मामूली परीक्षा मेरे सामने आयी, उसमें भगवान ने क्या साथ दिया यह अनुभव बहुत विशेष हुआ।

भगवान ज्ञान का सागर है
एक ने पूछा, ज्ञान क्या है? किसी ने कहा, ज्ञान प्रकाश है, किसी ने कहा, ज्ञान शक्ति है, किसी ने कहा, ज्ञान सद्गुण है (Knowledge is Virtue) । एक ने कहा, ज्ञान समस्या निवारक है (Knowledge is problem solving) ज्ञान समस्याओं का समाधान करता है। मनुष्य आविष्कार, शोधकार्य करते हैं, क्यों? उनके सामने कोई समस्या उपस्थित होती है, उसको हल करने के लिए अपना दिमाग़ लगाते हैं। औषधशास्त्र (Medical Science) क्या है? शरीर की जो भी समस्यायें हैं, उनका हल करना। परमात्मा तो ज्ञान का सागर है, अगर ज्ञान समस्याओं का हल है, तो ज्ञान सागर भी तो समस्या का समाधान करते होंगे! नहीं तो ज्ञान का क्या फायदा है? ज्ञान उसको कहा जाता है जिसका उपयोग हो, जिससे मानव की समस्यायें दूर हों ।
बाबा कैसे हमारी समस्याओं को हल करता है? परमात्मा के कई गुण ऐसे हैं, लगता है कि ये विरोधात्मक हैं। जैसे परमात्मा दयालु है और न्यायकारी भी है। अगर न्यायकारी है, तो दया कैसे करता है? दया करता है तो न्याय थोड़ा-बहुत कम करता होगा । न्याय करता है तो दया करने में थोड़ा तो फरक पड़ता होगा ! तो वो न्यायकारी है या दयालु है? अगर दोनों है तो एक ही समय दोनों कैसे है? गरम भी है, ठंडा भी है यह कैसे ? बाबा कहता है कि मैं आनन्द का सागर हूँ, साथ में यह भी कहता है कि मैं आपका बाप हूँ, शिक्षक हूँ। तुम कोई ग़लती करते हो तो रियायत करता हूँ, माफ़ करता हूं थोड़ा बहुत फिर जब धर्मराज का रूप लूंगा और सामने आओगे, उस समय कोई रियायत नहीं होगी। आनन्द का सागर, जब धर्मराज का रूप लेता है क्या तब भी वह आनन्द स्वरूप रहता है? हाँ, रहता है। क्योंकि परमात्मा में किसी भी गुण का लोप नहीं होता। कभी भी उसमें अभाव नहीं होता। वो समाप्त हो जाये या कुछ अंश कम हो जायेह ऐसा नहीं होता।
हमें अनुभूति (realisation) होती रहती है। यह अनुभूति तब होती हैं जब हमारे पास परिस्थितियाँ आती हैं। उन परिस्थितियों में बाबा हमारे लिए क्या करता है, कैसे करता है, वो पता पड़ता है। मैं मिसाल दूँ। मैं तो बच्चे की तरह हंसते, खेलते, घूमते सेवा करता था। मैं ऐसा समझता था कि मैं एक छोटा बच्चा हूं, मेरे में शक्ति है, मैं क्या नहीं कर सकता हूँ ! योग बल है, ज्ञान बल है, पवित्रता बल है, बाबा की कृपा है तो क्या नहीं कर सकता! खूब खेलते-कूदते चल रहा था। अचानक मुझे एक शारीरिक व्याधि ने घेर लिया। अब क्या करें? मेरे में ज्ञान है, ज्ञान समस्याओं का हल करता है, भगवान हमारा साथी है। मेरी समस्या बाबा को पता है। वह मेरी समस्या हल करता है, वह दयालु है, दया करता है। अगर मैंने गलतियाँ की हैं तो कहता है कि बच्चे, तुमने यह ग़लती की है, यह भोगो, तो वह न्यायकारी हुआ। अगर मैं जो भी करूँ उस पर वह दया करता रहेगा तो लोग कहेंगे कि भाई, तुम कुछ भी गड़बड़ करते रहो, आखिर भगवान दयालु है, वह दया करता रहेगा। जैसे ज्ञान का सागर है, वैसे दया का भी सागर है। ऐसा नहीं कि वह दया की नदी है। कैसे वो उन परिस्थितियों में दया करता है और साथी का साथ निभाता है? वो प्रेम का सागर है और प्रेम भी निभाता है। न्यायकारी है, न्याय भी करता है, वो ज्ञान का सागर है, मुझे क्या तकलीफ है वो भी जानता है। उसका क्या इलाज़ है, वो भी जानता है। यह अनुभव की बात है। वो आयुर्वेद भी जानता है, एलोपेथी भी जानता है, होमियोपेथी भी जानता है, एक्युपंक्चर भी जानता है, एक्युप्रेशर भी जानता है। वो हरके रोग का निदान जानता है।

भगवान कभी नियम को नहीं तोड़ता
वो जानता है कि यह मेरा बच्चा है और रोज़ कहता है कि मीठे बच्चे, तो मीठे बच्चे का कुछ करो। आपके साथ हूँ, आपका बना हूँ तो कुछ करो इस बीमारी का तो वो कैसे करता है? अपने कर्तव्य वो कैसे निभाता है? एक मिनट सोच लीजिये। अगर वो बता दे कि आपको यह तकलीफ है, यह गोली खा लो। दस दिन तक खाओ, तुम ठीक हो जाओगे। तुम मेरी सेवा करते हो, तुम मेरे बहुत प्रिय हो इसलिए मैं तुम्हें यह कहता हूँ। अगर बाबा भी दवाई देना शुरू कर दे तो डॉक्टरों का पार्ट बन्द हो जायेगा। भगवान ने एक दृष्टि डाल दी तो हार्ट के जो भी ब्लॉक हैं सारे के सारे ख़त्म हो जायेंगे। फिर डॉक्टर्स को इतनी सारी मेहनत करने की क्या आवश्यकता है? वो सर्वशक्तिमान है, कुछ भी कर सकता है। वो सर्वज्ञ है, सब कुछ जानता है। मरीज़ का एक्सरे करते हैं, एम. आर. आई. करते हैं, अल्ट्रासाउण्ड करते हैं लेकिन भगवान को कुछ भी करने की जरूरत नहीं है। मैंने देखा है, अनुभव किया है। जब बाबा से पूछा जाता है, बाबा पहले से जानता होता है। फिर भी कहता है, जाओ, डॉक्टर से राय करो। वो समझता है कि सिर्फ जगदीश ही मेरा बच्चा नहीं है, डॉक्टर्स भी मेरे बच्चे हैं। उनका भी पार्ट चलता रहे। बाबा न्याय भी करता है, दया भी करता है। भले ही मैं भगवान का प्रिय बच्चा हूँ लेकिन कर्म मैने किया है, उसका फल तो मुझे ही भोगना पड़ेगा, यह कर्म का नियम है। नियम माना नियम, नियम को कभी भगवान नहीं तोड़ता। अगर न्यायाधीश के सामने गलती करके उसका बच्चा जाये और उसको बिना सज़ा, छोड़ दिया जाये कि तुमने कोई गलती नहीं की है, तुम चले जाओ, तुम आज़ाद हो, यह कैसे चलेगा? लोग कहेंगे कि यह अपने बेटे के साथ ऐसा करता है और हमारे साथ ऐसा करता है। यह न्यायाधीश होकर भी पक्षपात करता है। वो पक्षपाती कहलायेगा, न्यायकारी नहीं कहलायेगा । भगवान न्यायकारी है। लेकिन साथ भी देता है, मदद भी करता है। इसके काफी अनुभव मुझे इस ईश्वरीय जीवन में हुए हैं।

भगवान मौके पर साथ देता है, मदद करता है।
शुरू-शुरू में बहुत लोगों ने विरोध किया। लोग बड़ी संख्या में विरोध करने, डराने धमकाने आते थे। कई लोगों ने हाथों में छूरी लिये हुए हमारे ऊपर हमला किया। उस समय अगर हमारी जबान से एक शब्द भी निकला होता तो हमारी गर्दन एक तरफ और धड़ एक तरफ हो जाता अथवा उनके दिमाग में थोड़ी-सी गरमी और आ गयी होती अथवा ब्लड प्रेशर और बढ़ गया होता तो वे हमारे अस्तित्व को ही नष्ट कर देते। ऐसे मौके पर भी भगवान ने मदद की। विविध प्रकार की परिस्थितियां आयीं, उनमें उसने साथ दिया। मैं एक भी मिसाल नहीं दे सकता कि उसने साथ नहीं दिया है। दिया है, पक्का मैं कहता हूँ, उसने दिया है।

अगर शरीर की कुछ तकलीफें हुई भी होंगी तो उनमें भी बहुत अनुभव हुए हैं। उसके साथ का अनुभव हुआ है कि वो कैसे हमारे साथ है और साथ देता है। हमारे हाथ में उसका हाथ है। इन तकलीफों में भी हमें प्राप्ति हो रही है, ऐसा ही हमको अनुभव होता था। कुछ शारीरिक तकलीफें हुई भी सही लेकिन बाबा ने मदद भी बहुत की। डॉक्टर्स को टच किया या मुझे बताया कि क्या करो और क्या न करो। एक डॉक्टर एक बात कहता है, दूसरा दूसरी कहता है, तीसरा तीसरी कहता है। उनमें आपस में एकता नहीं है, विचार उनका मिलता नहीं है। बाबा कहता है कि बच्चे, तुम यह करो। लेकिन पहले, डॉक्टर्स के पास भेजता है। आप कहेंगे, पहले ही बता दे ना, डॉक्टर्स के पास भेजने की क्या जरूरत है? नहीं। कर्मों की गति वो जानता है। किस आत्मा का क्या पार्ट हैं, किससे तीन-चार क्या लेना-देना है, कैसे चुक्ता होना है, वो जानता है। जब उसने हमारी ज़िम्मेवारी ले ली है और कहता है, मैं तुम्हें बन्धनों से छुड़ा दूंगा, तो कैसे छुड़ाना यह उसकी रीति-नीति है। यह सब वो जानता है, सारी बातें हम नहीं जानते। कर्मों की गति बहुत गहन है और वही उसका ज्ञाता है। वो करता रहता है। साथ-साथ हमने देखा कि हम कई बातों में व्यस्त हैं। आज यह कॉन्फ्रेन्स है, कल सेमिनार है, परसो मीटिंग है, ये हैं, वो है जैसे संसार के लोग अपने कार्य व्यवहार में व्यस्त हैं, लेकिन हम लोग अलग किस्म के सेवाकार्य में व्यस्त ही व्यस्त है। ठीक है, वो भी शिव बाबा का काम है, हम निमित्त बनकर करते हैं, हमारा कोई अपना धंधा नहीं है। बाबा की सेवा में हम उपस्थित हैं। उनमें और हमारे में बहुत फरक है। लेकिन फिर भी, जो हमारी योग की स्टेज़ होनी चाहिए, जो अनुभव हमें होने चाहिए, हमारी आध्यात्मिकता का जो विकास होना चाहिए वो कई दफ़ा रुक जाता है। होता नहीं है। बापदादा आते हैं, हमें सावधान करते हैं। हम उस बात को समझते है लेकिन उसके बाद फिर सेवा में व्यस्त। उसके लिए समय नहीं देते, ध्यान नहीं देते।

एकाग्रता पर बाबा ने कितना कहा है। निरन्तर याद पर बाबा ने कितना कहा है! बाबा कहते हैं, आठ घंटे योग लगाओ, आठ घंटे नहीं तो चार घंटे लगाओ। अगर बच्चे, यह भी दिक्कत होती है तो हर घंटे में समय निकालो। सहज बनाकर बाबा ने कई तरीके से बताया है। मैं भी कई वर्षों से कह रहा था, मुझे अलग से थोड़ा समय चाहिए। क्योंकि कर लिया, बहुत कर लिया। हरेक चीज़ का समय होता है, तब आदमी कर लेता है। फिर एक समय ऐसा भी आना चाहिए जो हम तपस्या करें। हम साधना में लग जायें। जब हमारी संस्था में इतने भाई-बहनें आ गये और कार्यकुशल हैं, हमसे ज्यादा अच्छे हैं, जानते हैं कार्यों को उनको भी अवसर मिल सके, वो कर सकें। 1 मेरा यह कहना हमेशा रहता था कि मुझे इन कार्यों से निवृत्त होना चाहिए। लेकिन छूट नहीं पाता था। बड़ों के आग्रह से करना पड़ता था ।

बाबा के मन में जो प्लान है, होता तो वही है। बाबा जैसे चाहता है, वैसे ही होगा। यूँ कहिये, जो होना होता है, बाबा भी वही चाहता है। बाबा ने कहा, आओ बच्चे, लेट जाओ चारपाई पर हॉस्पिटल में भर्ती हो जाओ। अब देख लो समय मिलता है या नहीं। इस व्याधि से मुझे नये प्रकार की सेवा, नये प्रकार के क्रिया-कलाप करने का चान्स मिला, जीवन में एक नया मोड़ जैसे कि आ गया। बाबा ने मुझे समय दिया। मैं तो किताब लिखता हूँ या और कोई सेवा करता हूँ यह और प्रकार की सेवा है। इस समय कई परिस्थितियाँ आयीं, कई डॉक्टर आये, नर्स आयीं, कुछ ट्रस्टी आये, कुछ विशेष लोग मिलने आये। उस समय लेटे हुए क्या कहूं? मुझे आश्चर्य होता था कि बाबा कैसे टच करते थे! अचानक से, जब मन में नहीं, चित्त में नहीं, तब वो बात उनसे कह देता था, वो उनको फिट बैठती थी। यहाँ तक कि वो लोग आकर खुद कहते थे कि आज के लिए कुछ बताइये। आज का पाठ क्या है?
यह नयी सेवा मिली, उनको योगयुक्त दृष्टि दो, कोशिश करो कि वे शरीर से न्यारापन अनुभव करें, इनकी इस प्रकार की सेवा करो। मैं यह चाहता था कि यह सेवा करूँ ताकि अपनी स्थिति बढ़े और दूसरों को भी कुछ लाभ मिले। वो कहें कि आज हमें वो अनुभव हुआ, पहले यह नहीं हुआ था; इतने वर्षों तक हम चलते रहे लेकिन ऐसा अनुभव नहीं हुआ था जो आज हुआ। कई लोगों ने अपनी वाणी से कहा कि आज हमें जो अनुभव हुआ, हमारा जीवन सफल हो गया। कई वर्षों से ज्ञान में आते रहे लेकिन ऐसे अनुभव नहीं हुए। कराने वाले तो बाबा हैं। लेकिन बाबा ने मुझे चान्स दिया, निमित्त बनाया। जब अपनी स्थिति ऐसी होगी, तब ही हम दूसरों की सेवा कर सकते हैं। उसके लिए बाबा ने मुझे बहुत मदद की, बहुत मदद की। डॉक्टरों ने शक्तिशाली दवाइयाँ दी, एन्टीबायोटिक दी, दिनभर क्या-क्या करते रहे! कई इंजेक्शन लगाते रहे। वो अपना कार्य करते रहे लेकिन मैं बाबा की याद में, मौज में, आनन्द में रहा। वह अच्छा और विशेष अनुभव बाबा ने मुझे कराया।

इलाज के लिए गया था, जब उन्होंने इलाज शुरू किया, उन्होंने अपने ढंग से किया। बीच-बीच में पूछते रहे, उल्टी आने का ख्याल तो नहीं आ रहा है? सिर तो घूम नहीं रहा? घबराहट तो नहीं लग रही है? जब कुछ था नहीं तो मैंने कहा, नहीं। आप आगे बढ़िये, ऐसी कोई बात नहीं। बाबा की याद में था। बाबा से बातें कर रहा था, “बाबा यह परीक्षा है, बाबा मुझे इसे पास करना है। आपने भी कई दफा कहा है कि ऐसी परिस्थिति को पार करो, यह देह की परीक्षा आयेगी, अन्त में हरेक के सामने आयेगी। आज वो परीक्षा मेरे सामने आयी है। इस पेपर को मुझे ठीक तरह से पास करना है।” ऐसे बाबा से बातें करता था। डॉक्टर्स अपना काम करते थे, मुझे पता भी नहीं लगता था कि पूरा हो गया या क्या हो गया। कुछ भी, रंचक मात्र भी ऐसी कोई बात नहीं थी। फिर उन्होंने एक दिन छोड़कर दूसरे दिन इंजेक्शन लगाया, बहुत स्ट्रांग दवाई दी लगाते समय भी उन्होंने कई दफा पूछा, आपको ऐसा तो नहीं हो रहा है, वैसा तो नहीं हो रहा है। मुझे कुछ नहीं हो रहा था।

उसके बाद का जो अनुभव था वो बहुत विशेष अनुभव था 40-45 वर्षों तक मैंने कोई दवाई नहीं ली थी। कोई गोली, कोई इंजेक्शन लिया नहीं था। इन दवाइयों से चेहरे पर कुछ फरक आया। चेहरा लाल-लाल हो गया। उनको लगा कि इसके लिए इतना डोज (Dose: खुराक) काफ़ी है। इसको यहीं बन्द करो। फिर मुझे ले गये एक कमरे में, वहाँ कुछ करना था वो कर लिया। उसके बाद मुझे गहरी नींद आ गयी आधा घंटा । क्योंकि सारी रात एक पल भी मैं सोया नहीं था। अलर्ट था, जैसे जाग रहा हूँ। कुछ थकावट नहीं, कुछ ख्याल नहीं। नींद का विचार ही नहीं। मैं बाबा की याद में रहा, अपने आनन्द, मस्ती में रहा। रात ऐसी ही गुजरी। जब रात को सोया नहीं, वो नींद मुझे आयी, मैं थोड़ा सोया। उसके बाद का जो अनुभव था वो बहुत विशेष अनुभव था। बहुत ही विशेष अनुभव था। जैसे मैं देह से अलग हूँ। मेरा कनेक्शन भी जुटा हुआ है। लेकिन ऊपर मैं तैर रहा हूँ। यह शरीर मेरा नीचे पड़ा हैं, मैं देख रहा हूं कि क्या कर रहे हैं डॉक्टर लोग उस चीज़ का कोई अहसास मुझे नहीं हो रहा था। आनन्द में हूँ, शान्ति में हूँ । बहुत अतीन्द्रिय सुख में हूँ। ऐसा लग रहा था कि जीवन है तो यही है। ऐसा अनुभव करीब दो-ढाई घंटे लगातार रहा। मन यह कहता था कि अब मैं नीचे नहीं उतरू । किसी से बात नहीं करूं। पास वाले कमरे में बहन-भाई बैठते थे, बार-बार आते थे। कई मधुबन से आये थे, उनको आगे की गाड़ी या फ्लाइट से जाना था। वे ओम् शान्ति कहकर जाना चाहते थे। बार-बार दरवाज़ा खोलकर देखते थे। मुझे दिखायी देते थे, कौन आये हैं। तो मैंने उनको इशारा किया कि वो आयें। ओम् शान्ति की, बोल नहीं निकले, संकल्प से ओम् शान्ति की दृष्टि का आदान-प्रदान हुआ। बस इतना। लेकिन बोलने का । बिल्कुल मन नहीं था । ऐसा महसूस हो रहा था कि मैं लाइट का हूँ, मैं माइट हूँ। मैं इस स्थिति में था। ऐसा अनुभव रहा, बहुत अच्छा रहा।ऐसा नहीं, उसके बाद अनुभव नहीं हुआ। जैसे दवाई का असर, बाद में भी कई दिनों तक रहता है वैसे उसका असर भी कई दिनों तक गया नहीं, अभी तक उपराम, इस दुनिया में कोई रस नहीं। बेहद का वैराग अपने आप आ गया था। ऐसा वैराग था कि यहाँ की कोई चीज़ की ज़रूरत नहीं, चाहिए नहीं। आप यह देखिये, भगवान हमारा साथी है, कैसे हमारा साथ दिया है ! ये सब अनुभव उसने कैसे कराये! ये उसके वरदान हैं। हम समझते नहीं हैं। हम समझते हैं कि मुझे इतनी बड़ी व्याधि आयी, भगवान ने मदद क्यों नहीं की। इसके पीछे कई राज़ होते हैं। यह शरीर तो शाश्वत है नहीं, आज नहीं तो कल इसको विनाश होना ही पड़ेगा। कब तक भगवान से इस शरीर का इलाज कराते रहोगे? क्या भगवान से सिर्फ यही लेना चाहते हो? यही दवाई लेना चाहते हो? और कुछ लेना नहीं चाहते हो? उसके पास जो अच्छे अनुभव हैं, अच्छे वरदान हैं वो लेने चाहिए या केमिस्ट से जो मिलता है या डॉक्टर जो बता सकता है वही हमें भगवान से लेना है? ऐसा नहीं। मैंने तो सदा मन में रखा है कि हमारा जीवन उसके हाथ में है, वो जहाँ रखे, जैसे रखे, जो हमसे सेवा ले, जब तक चाहे ले। यह फूल उसको हम चढ़ा चुके हैं। यह हमारा है ही नहीं। फिर क्यों किसी बात की आशा करें, चिन्ता करें? ऐसा पूछना, यह तो भगवान में अविश्वास है ।

कई लोग एक-दूसरे से पूछते थे, हमारे साथ एक बहन थी, जो मुझे दवाई आदि देती थी, उससे भी पूछते थे कि जगदीश भाई को कोई ख़्याल नहीं होता इस तकलीफ से ? कोई चिन्ता तो नहीं है? कोई डर तो नहीं इनके मन में? मुझे बड़ा आश्चर्य होता था। ऐसा पूछना, यह तो भगवान में अविश्वास है। जब इतने वर्षों तक योगाभ्यास किया, बाबा के अंग-संग रहा, बाबा की सेवा में लगा रहा, उसके बाद भी हमें डर रहेगा या चिन्ता रहेगी? अगर हमने यही नहीं समझा कि हम आत्मा हैं, आत्मा अमर है, अविनाशी है, यह शरीर विनाशी है, कर्मों का फल क्या होता है, अभी क्या है ये सारी बातें हमें समझ में आ गयीं, उसके बाद क्या हमारे में ऐसे भाव होंगे? ऐसे गलत विचार भी कई लोग करते थे। सुनकर मुझे बड़ा आश्चर्य होता था। कई लोग समझते हैं कि इसको जो बीमारी है, उसका परिणाम क्या होगा, यह जगदीश भाई को नहीं पता होना चाहिए। मुझे हंसी आती है उन लोगों पर। क्योंकि हमने तो जीवन में समय व्यर्थ गंवाया ही नहीं, किसी को कष्ट देने का कोई काम किया ही नहीं। जहाँ तक हो सका सबसे प्रेम से, सम्मान से, सेवा भाव से, शुभ भावना, शुभ-कामना से व्यवहार करते हुए जीवन का क्षण-क्षण लगाया है। किसी वस्तु, व्यक्ति, वैभव को अपने लिए रिज़र्व ( Reserve; अलग निकाल) करके रखा नहीं है, कोई जोन इंचार्ज बने नहीं, सेन्टर इंचार्ज बने नहीं, कोई विंग इंचार्ज बने नहीं, जब हमारा कुछ भी है नहीं, जब हम फ्री हैं तो किसी भी समय, किसी भी क्षण जाने के लिए तैयार हैं। मेरे लिए कुछ भी तकलीफ नहीं है। बीमारी तो शरीर को आयी है, मुझे नहीं मैं तो बिल्कुल ठीक-ठाक हूँ। मैं तो बाबा की याद में मस्त हूँ तन्दुरुस्त हूँ।

ब्र.कु जगदीश चन्द्र हसिजा 

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